एक दिन की भक्ति

आज सावन का पहला सोमवार है।

सुबह ही मंदिर के बाहर

लोगों की भीड़ एकत्र थी —

हर किसी के हाथ में कुछ अलग,

दूध, बेलपत्र, घी, फूल, सिंदूर।

जैसे हर वस्तु

भक्ति का प्रमाणपत्र हो,

श्रद्धा की गहराई नहीं,

उसकी मात्रा बोल रही हो।

मैंने पहली बार

भगवान शिव को सिंदूर से सना देखा।

आश्चर्य हुआ —

क्या यह भी किसी नई विधि का हिस्सा है?

या लोगों ने महादेव को

अपनी सुविधा का देवता बना लिया है?

कुछ चेहरों पर देखा

एक मौन प्रतिस्पर्धा —

जिनके पास अधिक सामग्री थी,

वे स्वयं को अधिक भक्त समझ बैठे।

घमंड था आँखों में —

जैसे भक्ति अब तुलना की चीज़ हो।

शाम को आँधी थी, वर्षा थी,

हवा में भी एक तरह की व्याकुलता थी।

फिर भी मंदिर में भीड़ थी —

लोग जल चढ़ा रहे थे,

मानो जल न चढ़े तो शिव न मिलें।

किसी ने न पूजा रोकी,

न एक पल को ठिठका —

शायद श्रद्धा थी,

या फिर वही डर,

कि कहीं कोई दूसरा न दिखा दे

अपने भक्ति का बेहतर असर।

पहली बार

शाम को जलाभिषेक देखा।

वह भी उस भीषण तूफ़ान में —

मन में यह प्रश्न गूंजा,

“यह भक्ति है, या कोई झूठा इम्तिहान?”

ऐसी भीड़ मैंने

केवल महाशिवरात्रि के दिन देखी थी —

लंबी कतारें,

हर हाथ में कैमरा,

हर आँख में एक इंस्टा-योजना,

हर कथा में एक ही पंक्ति —

#महादेव_के_दीवाने।

परंतु अगली सुबह —

मंदिर एकदम सूना था।

बस एक पुजारी,

कुछ बुझते दीप,

और मैं।

कल रात जहाँ आस्था उफन रही थी,

आज वहाँ मौन की सरिता बह रही थी।

कल जिनके हाथ भक्ति से कांपते थे,

आज वही कहीं और व्यस्त थे।

शायद कल वैसी ही

सुबह फिर देखने को मिलेगी।

तो क्या समझूँ?

क्या भगवान भी अब

हमारी ही तरह

भीड़ में कुछ क्षणों को चमकते हैं,

और फिर अकेले रह जाते हैं?

क्या वे भी

मनुष्य की क्षणिकता का भार उठाते हैं?

क्या वे भी प्रतीक्षा करते हैं —

किसी ऐसे आगंतुक की

जो बिना तामझाम,

बिना फ़ोटो,

केवल मौन लेकर आए?

एक दिन जल के लिए संघर्ष होता है,

और अगले दिन

नाम तक नहीं लिया जाता।

क्या ईश्वर भी अब

मानव के अभिनय का पात्र हो गए हैं?

जो सदा से मोहमुक्त थे,

क्या अब मोह के मापदंड से तौले जा रहे हैं?

मैं कोई बड़ा भक्त नहीं हूँ।

नहीं हूँ।

परंतु यह प्रश्न भीतर स्थिर नहीं रहता —

क्या उनकी निर्ममता में

पीड़ा की कोई रेखा नहीं खिंचती?

जब उत्सव समाप्त हो जाता है,

दीप बुझ जाते हैं,

मंदिर फिर से मौन में लिपट जाता है —

तो क्या वह शून्यता

केवल मेरे भीतर होती है,

या महादेव के भी हृदय में?

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